हम-साए जागते रहे नालों से रात भर सोए हुए नसीब को क्यूँकर जगाएँ हम

“My neighbors were kept awake all night by my laments; how, then, are we to awaken our sleeping destiny?”

— दाग़ देहलवी
अर्थ

हमारी आहों और रोने की आवाज़ से पड़ोसी रात भर जागते रहे, लेकिन हम अपनी सोई हुई क़िस्मत को कैसे जगाएँ?

विस्तार

इस शेर में एक बड़ा ही दर्दनाक और खूबसूरत विरोधाभास है। शायर कहता है कि मेरी सिसकियों और दर्द भरी चीखों ने पूरी रात पड़ोसियों की नींद उड़ा दी, मगर अफ़सोस कि यह दर्द मेरी अपनी सोई हुई क़िस्मत को न जगा सका। यहाँ 'सोए हुए नसीब' का रूपक इंसान की उस बेबसी को बयां करता है, जहाँ आपकी आहें सारी दुनिया तो सुन लेती है लेकिन मुक़द्दर फिर भी बेअसर रहता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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