“How fond your nature is of flattery and praise; for God's sake, how long must we our entreaties raise?”
आपका स्वभाव चापलूसी कितना पसंद करता है; ईश्वर के लिए हम कब तक आपसे मिन्नतें और गुज़ारिशें करते रहें?
इस शेर में आशिक़ अपने महबूब की उस आदत पर एक मीठी सी शिकायत और बेबसी ज़ाहिर कर रहा है, जिसे हर पल तारीफ़ और खुशामद सुनने की चाह रहती है। मिन्नतें और आरज़ू करते-करते अब दिल थक चुका है, इसलिए वह झुँझलाकर पूछता है कि आख़िर कब तक यूँ ही गिड़गिड़ाना पड़ेगा। 'ख़ुदा के लिए' कहकर शायर ने अपनी गहरी लाचारी और तंग आ चुके सब्र को बहुत ख़ूबसूरती से पिरोया है।
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