यास ने क्या बुझा दिया दिल को कि तड़प कैसी इख़्तिलाज नहीं

“How completely despair has quenched this heart; let alone writhing, not even a tremor stirs.”

— दाग़ देहलवी
अर्थ

निराशा ने दिल को ऐसा बुझा दिया है कि तड़पना तो दूर, इसमें धड़कन या बेचैनी की ज़रा सी हरकत भी बाकी नहीं रही।

विस्तार

इस शेर में शायर गहरी मायूसी और दिल के पूरी तरह सुन्न हो जाने की दास्तान सुना रहा है। दिल को एक बुझे हुए चराग़ की तरह देखा गया है, जिसे नाउम्मीदी ने इस क़दर ठंडा कर दिया है कि उसमें ज़िंदगी की कोई तपिश बाकी नहीं बची। दर्द में इंसान तड़पता है या बेचैन होता है, लेकिन यहाँ तो दिल की हल्की सी धड़कन या कंपकंपी (इख़्तिलाज) तक ग़ायब है—यह रंज-ओ-ग़म का वो आख़िरी मुक़ाम है जहाँ तड़प भी ख़ामोश हो जाती है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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