खोटे दामों में ये भी क्या ठहरा दिरहम-ए-'दाग़' का रिवाज नहीं

“What worth could this possess, even at a debased price? / The coin stamped with a scar holds no currency at all.”

— दाग़ देहलवी
अर्थ

खोटे या सस्ते दामों में भी इसकी क्या क़ीमत मानी जा सकती है, क्योंकि दाग़ लगे हुए सिक्के (या 'दाग़' के दिरहम) का तो बाज़ार में कोई चलन ही नहीं है।

विस्तार

इस शे’र में दाग़ देहलवी ने अपने तख़ल्लुस और बाज़ार के सिक्कों का बड़ा दिलकश रूपक बाँधा है। जैसे दाग़ लगा या खोटा सिक्का बाज़ार में किसी काम का नहीं रहता और कोई उसे औने-पौने दामों में भी नहीं लेता, वैसे ही इश्क़ के ज़ख़्मों से भरा उनका दिल महबूब की नज़र में बेक़द्र हो चुका है। शायर ने अपनी बेबसी को एक हल्की सी शोख़ी और तंज़ के साथ बयां किया है कि दर्द और वफ़ा की इस दुनिया में अब कोई ख़रीदार नहीं बचा।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

ऑडियो

पाठUnavailable
हिंदी अर्थUnavailable
अंग्रेज़ी अर्थUnavailable
हिंदी विस्तारUnavailable
अंग्रेज़ी विस्तारUnavailable
Comments · 0

Free — just your email. You'll come right back here.

No comments yet. Be the first.