आरज़ू ही न रही सुब्ह-ए-वतन की मुझ को शाम-ए-ग़ुर्बत है अजब वक़्त सुहाना तेरा

“No longing now remains in me for the dawn of my homeland; O evening of exile, how wondrously pleasant is your hour!”

— दाग़ देहलवी
अर्थ

मुझे अब अपने वतन की सुबह की कोई चाहत नहीं रही, क्योंकि ऐ परदेस की शाम, तुम्हारा यह वक़्त अजीब तरह से बड़ा सुहाना है।

विस्तार

यह शेर परदेस और अकेलेपन की उस गहरी कैफ़ियत को बयां करता है जहाँ दर्द ही इंसान का सबसे क़रीबी हमदर्द बन जाता है। शायर अपने वतन की उजली और पुर-उम्मीद सुबह को भूलकर बेगाने शहर की ढलती शाम में एक अजीब सा सुकून पा रहा है। यह उस दिल की दास्तान है जिसने अपनी उदासी और बेगानगी को इतनी शिद्दत से अपना लिया है कि अब उसे वतन लौटने की कोई तमन्ना भी बाकी नहीं रही।

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