ग़ज़ल

ले चला जान मिरी रूठ के जाना तेरा

لے چلا جان مری روٹھ کے جانا تیرا
दाग़ देहलवी· Ghazal· 15 shers· radif: तेरा

यह ग़ज़ल महबूब के रूठकर चले जाने से उपजी गहरी विरह-वेदना और दिल की तड़प को व्यक्त करती है। इसमें प्रेमी का यह भाव झलकता है कि ऐसे पीड़ादायक मिलन से न मिलना ही बेहतर था, साथ ही वह महबूब के राज़ और यादों को ज़माने की नज़रों से महफ़ूज़ रखने की चाहत भी रखता है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
ले चला जान मिरी रूठ के जाना तेरा ऐसे आने से तो बेहतर था न आना तेरा
तुम्हारा रूठकर चले जाना मेरी जान लिए जा रहा है; इस तरह आने से तो बेहतर था कि तुम आते ही नहीं।
2
अपने दिल को भी बताऊँ न ठिकाना तेरा सब ने जाना जो पता एक ने जाना तेरा
मैं अपने दिल को भी तुम्हारा ठिकाना नहीं बताऊँगा, क्योंकि अगर किसी एक को भी तुम्हारा पता चल गया तो सबको मालूम हो जाएगा।
3
तू जो ऐ ज़ुल्फ़ परेशान रहा करती है किस के उजड़े हुए दिल में है ठिकाना तेरा
ऐ ज़ुल्फ़, तू जो हमेशा बिखरी और परेशान रहती है, किस उजड़े हुए दिल में तेरा ठिकाना है?
4
आरज़ू ही न रही सुब्ह-ए-वतन की मुझ को शाम-ए-ग़ुर्बत है अजब वक़्त सुहाना तेरा
मुझे अब अपने वतन की सुबह की कोई चाहत नहीं रही, क्योंकि ऐ परदेस की शाम, तुम्हारा यह वक़्त अजीब तरह से बड़ा सुहाना है।
5
ये समझ कर तुझे ऐ मौत लगा रक्खा है काम आता है बुरे वक़्त में आना तेरा
ऐ मौत, मैंने तुम्हें यह सोचकर अपने करीब रखा है कि कठिन और बुरे समय में तुम्हारा आना ही काम आता है।
6
ऐ दिल-ए-शेफ़्ता में आग लगाने वाले रंग लाया है ये लाखे का जमाना तेरा
ऐ मेरे आशिक़ दिल में आग लगाने वाले महबूब, तेरा यह सुर्ख़ लाख जमाना (रंग लगाना) अब अपना असर और रंग दिखा चुका है।
7
तू ख़ुदा तो नहीं ऐ नासेह-ए-नादाँ मेरा क्या ख़ता की जो कहा मैं ने न माना तेरा
ऐ नादान नसीहत करने वाले, तू मेरा ख़ुदा तो नहीं है; अगर मैंने तेरी बात नहीं मानी तो इसमें मेरा क्या क़सूर है?
8
रंज क्या वस्ल-ए-अदू का जो तअ'ल्लुक़ ही नहीं मुझ को वल्लाह हँसाता है रुलाना तेरा
जब हमारे बीच कोई रिश्ता ही नहीं बचा, तो तुम्हारे रक़ीब (दुश्मन) से मिलने का मुझे क्या दुख? ख़ुदा की क़सम, मुझे रुलाने की तुम्हारी यह कोशिश मुझे सिर्फ़ हँसाती है।
9
काबा ओ दैर में या चश्म-ओ-दिल-ए-आशिक़ में इन्हीं दो-चार घरों में है ठिकाना तेरा
तुम्हारा ठिकाना बस इन्हीं दो-चार जगहों पर है—या तो काबा और मंदिर में, या फिर आशिक़ की आँखों और दिल में।
10
तर्क-ए-आदत से मुझे नींद नहीं आने की कहीं नीचा न हो ऐ गोर सिरहाना तेरा
पुरानी आदत छूट जाने से मुझे नींद नहीं आएगी, इसलिए ऐ क़ब्र, कहीं तेरा सिरहाना नीचा न हो।
11
मैं जो कहता हूँ उठाए हैं बहुत रंज-ए-फ़िराक़ वो ये कहते हैं बड़ा दिल है तवाना तेरा
जब मैं कहता हूँ कि मैंने जुदाई के बहुत रंज सहे हैं, तो वह कहते हैं कि तुम्हारा दिल बहुत ताक़तवर और मज़बूत है।
12
बज़्म-ए-दुश्मन से तुझे कौन उठा सकता है इक क़यामत का उठाना है उठाना तेरा
दुश्मनों की महफ़िल से भला तुम्हें कौन उठा सकता है? तुम्हारा वहाँ से उठना तो मानो क़यामत लाने जैसा कठिन और प्रलयंकारी काम है।
13
अपनी आँखों में अभी कौंद गई बिजली सी हम न समझे कि ये आना है कि जाना तेरा
अभी-अभी आँखों के सामने बिजली जैसी एक चमक कौंध गई, और हम यह समझ ही नहीं पाए कि यह तुम्हारा आना था या जाना।
14
यूँ तो क्या आएगा तू फ़र्त-ए-नज़ाकत से यहाँ सख़्त दुश्वार है धोके में भी आना तेरा
अपनी अत्यधिक नज़ाकत के कारण तू जान-बूझकर तो यहाँ क्या आएगा, धोखे या भूल से भी तेरा यहाँ आना बेहद मुश्किल है।
15
'दाग़' को यूँ वो मिटाते हैं ये फ़रमाते हैं तू बदल डाल हुआ नाम पुराना तेरा
वे 'दाग़' को इस तरह मिटाते हैं और कहते हैं कि तू अपना नाम बदल ले, क्योंकि अब तेरा नाम पुराना हो चुका है।
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