“Why grieve your union with the rival when no bond between us lies? By God, it only makes me laugh, this attempt to bring tears to my eyes.”
जब हमारे बीच कोई रिश्ता ही नहीं बचा, तो तुम्हारे रक़ीब (दुश्मन) से मिलने का मुझे क्या दुख? ख़ुदा की क़सम, मुझे रुलाने की तुम्हारी यह कोशिश मुझे सिर्फ़ हँसाती है।
यहाँ शायर बेपरवाही का लिबास ओढ़कर महबूब से कह रहा है कि अब तुम्हारे रक़ीब से मिलने का मुझे कोई मलाल नहीं, क्योंकि हमारे बीच कोई रिश्ता ही नहीं बचा। महबूब की यह साज़िश कि किसी तरह आशिक़ को जलाकर रुलाया जाए, इतनी साफ़ और बचकानी लगती है कि रोने के बजाय हँसी छूट पड़ती है। मगर इस तंज़िया हँसी के पीछे दिल की गहरी टीस और अपनी अना को महफ़ूज़ रखने की एक ख़ामोश कोशिश भी साफ़ झलकती है।
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