ग़ज़ल
अफ़्लाक से आता है नालों का जवाब आख़िर
افلاک سے آتا ہے نالوں کا جواب آخر
यह ग़ज़ल आध्यात्मिक तड़प, सच्ची पुकार और ईश्वरीय प्रेम के निरंतर संघर्ष को उजागर करती है। इसमें यह संदेश निहित है कि दिल की सच्ची आहें आख़िरकार फलक तक पहुँचकर परदे हटा देती हैं, और इश्क़ की यह यात्रा आरंभ से अंत तक तपन और समर्पण का ही दूसरा नाम है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
अफ़्लाक से आता है नालों का जवाब आख़िर
करते हैं ख़िताब आख़िर उठते हैं हिजाब आख़िर
आख़िरकार आसमान से फ़रियादों का जवाब आ ही जाता है। अंततः वे बात करते हैं और सारे पर्दे हट जाते हैं।
2
अहवाल-ए-मोहब्बत में कुछ फ़र्क़ नहीं ऐसा
सोज़ ओ तब-ओ-ताब अव्वल सोज़ ओ तब-ओ-ताब आख़िर
प्रेम की स्थिति में कोई अंतर नहीं होता; शुरुआत में भी जलन, बेचैनी और तड़प होती है और अंत में भी वही जलन और तड़प बनी रहती है।
3
मैं तुझ को बताता हूँ तक़दीर-ए-उमम क्या है
शमशीर-ओ-सिनाँ अव्वल ताऊस-ओ-रुबाब आख़िर
मैं तुम्हें बताता हूँ कि क़ौमों की तक़दीर क्या होती है: शुरुआत में तलवार और नेज़ा होते हैं, और अंत में मोर और रबाब (राग-रंग)।
4
मय-ख़ाना-ए-यूरोप के दस्तूर निराले हैं
लाते हैं सुरूर अव्वल देते हैं शराब आख़िर
यूरोप के मयख़ाने के तौर-तरीके बड़े अनोखे हैं, वहाँ नशा पहले लाया जाता है और शराब अंत में दी जाती है।
5
क्या दबदबा-ए-नादिर क्या शौकत-ए-तैमूरी
हो जाते हैं सब दफ़्तर ग़र्क़-ए-मय-ए-नाब आख़िर
चाहे नादिर शाह का दबदबा हो या तैमूर की शान-ओ-शौकत, अंत में हुकूमत और शान के सारे दफ़्तर ख़ालिस शराब में डूब ही जाते हैं।
6
ख़ल्वत की घड़ी गुज़री जल्वत की घड़ी आई
छुटने को है बिजली से आग़ोश-ए-सहाब आख़िर
एकांत का समय बीत चुका है और सबके सामने प्रकट होने की घड़ी आ गई है; आखिरकार बादलों की गोद से बिजली बाहर निकलने ही वाली है।
7
था ज़ब्त बहुत मुश्किल इस सैल-ए-मआ'नी का
कह डाले क़लंदर ने असरार-ए-किताब आख़िर
अर्थों और भावों के इस सैलाब को रोके रखना बहुत मुश्किल था, इसलिए आख़िरकार क़लंदर ने किताब (कुरान) के छिपे हुए राज़ बयान कर ही दिए।
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