अब जुनूँ आप है गरेबाँ-गीर अब वो रस्म-ए-तकल्लुफ़ात गई

“Now madness itself clutches at the collar; gone forever is that ritual of polite restraint.”

— जिगर मुरादाबादी
अर्थ

अब दीवानगी खुद अपने ही गिरेबान को पकड़ रही है और औपचारिकता या तकल्लुफ़ की वह पुरानी रस्म अब ख़त्म हो चुकी है।

विस्तार

उर्दू शायरी में गिरेबाँ पकड़ना या चाक करना दीवानगी और बेखुदी की आख़िरी हद माना जाता है। शायर कह रहे हैं कि अब मोहब्बत का जुनून इस कदर हावी हो चुका है कि उसने खुद ही गिरेबाँ थाम लिया है, और दुनियादारी का सारा बनावटी सलीका ख़त्म हो गया है। यह उस मोड़ की दास्तान है जहाँ दिल के जज़्बात इतने बेबस और सच्चे हो जाते हैं कि समाज के तौर-तरीके और तकल्लुफ़ात पीछे छूट जाते हैं।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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