ग़ज़ल

दिल गया रौनक़-ए-हयात गई

دل گیا رونق حیات گئی
जिगर मुरादाबादी· Ghazal· 14 shers· radif: गई

यह ग़ज़ल दिल के चले जाने और उसके साथ ही जीवन की सारी रौनक़ व सार्थकता छिन जाने के गहरे दर्द को बयां करती है। अनकही बातों और महबूब की फिरती नज़रों की कसक के ज़रिए इसमें प्रेम की नज़ाकत और वियोग की विवशता को अत्यंत मार्मिक रूप से दर्शाया गया है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
दिल गया रौनक़-ए-हयात गई ग़म गया सारी काएनात गई
जब दिल चला गया तो ज़िंदगी की रौनक़ ख़त्म हो गई, और जब ग़म भी चला गया तो जैसे पूरी कायनात ही मिट गई।
2
दिल धड़कते ही फिर गई वो नज़र लब तक आई न थी कि बात गई
जैसे ही दिल धड़का वह निगाह मुड़ गई, और बात अभी होंठों तक पहुँची भी नहीं थी कि कहने का अवसर हाथ से निकल गया।
3
दिन का क्या ज़िक्र तीरा-बख़्तों में एक रात आई एक रात गई
बदकिस्मत लोगों के बीच दिन का ज़िक्र ही क्या करना; उनके लिए तो बस एक रात आती है और दूसरी रात बीत जाती है।
4
तेरी बातों से आज तो वाइ'ज़ वो जो थी ख़्वाहिश-ए-नजात गई
ऐ उपदेशक, आज तुम्हारी बातें सुनकर मेरे मन में मुक्ति पाने की जो इच्छा थी, वह भी ख़त्म हो गई।
5
उन के बहलाए भी न बहला दिल राएगाँ सई-ए-इल्तिफ़ात गई
उनके बहलाने की कोशिश करने पर भी यह दिल नहीं बहला, और उनका ध्यान देने व मनाने का सारा प्रयास व्यर्थ चला गया।
6
मर्ग-ए-आशिक़ तो कुछ नहीं लेकिन इक मसीहा-नफ़स की बात गई
आशिक़ की मौत अपने आप में कोई बड़ी बात नहीं थी, लेकिन इससे जीवन देने वाले उस मसीहा की प्रतिष्ठा चली गई।
7
अब जुनूँ आप है गरेबाँ-गीर अब वो रस्म-ए-तकल्लुफ़ात गई
अब दीवानगी खुद अपने ही गिरेबान को पकड़ रही है और औपचारिकता या तकल्लुफ़ की वह पुरानी रस्म अब ख़त्म हो चुकी है।
8
हम ने भी वज़-ए-ग़म बदल डाली जब से वो तर्ज़-ए-इल्तिफ़ात गई
जब से आपका ध्यान और स्नेह दर्शाने का वह अंदाज़ ख़त्म हुआ, हमने भी अपने ग़म को सहने और ज़ाहिर करने का तरीक़ा बदल दिया।
9
तर्क-ए-उल्फ़त बहुत बजा नासेह लेकिन उस तक अगर ये बात गई
ऐ नसीहत देने वाले, मोहब्बत छोड़ देने का तुम्हारा मशवरा बिल्कुल सही है, लेकिन अगर यह बात महबूब तक पहुँच गई तो क्या होगा?
10
हाँ मज़े लूट ले जवानी के फिर न आएगी ये जो रात गई
हाँ, अपनी जवानी का भरपूर आनंद ले लो, क्योंकि अगर यह रात एक बार बीत गई तो दोबारा लौटकर नहीं आएगी।
11
हाँ ये सरशारियाँ जवानी की आँख झपकी ही थी कि रात गई
जवानी का नशा और खुमारी ऐसी थी कि अभी आँख झपकी ही थी कि पूरी रात बीत गई।
12
जल्वा-ए-ज़ात ऐ मआ'ज़-अल्लाह ताब-ए-आईना-ए-सिफ़ात गई
अल्लाह पनाह दे, ईश्वर की ज़ात (मूल सत्ता) का ऐसा जलवा प्रकट हुआ कि उसके सामने सिफ़ात (गुणों) के आईने की बर्दाश्त करने की ताक़त ही ख़त्म हो गई।
13
नहीं मिलता मिज़ाज-ए-दिल हम से ग़ालिबन दूर तक ये बात गई
मेरे अपने दिल का मिज़ाज अब मुझसे मेल नहीं खाता; ऐसा लगता है कि यह बात बहुत दूर तक निकल चुकी है।
14
क़ैद-ए-हस्ती से कब नजात 'जिगर' मौत आई अगर हयात गई
ऐ जिगर, इस ज़िंदगी के क़ैदख़ाने से रिहाई कब मुमकिन है? क्योंकि अगर मौत आकर आज़ाद भी करेगी, तो ज़िंदगी ही ख़त्म हो जाएगी।
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