तदर्रौ-ओ-कबक पर हँस कर उठ्ठे ख़ुद लड़खड़ाते हैं सुबुक करते हैं उन को पाएँचे बार-ए-गिराँ हो कर

“Laughing at the pheasant and partridge's grace, they rise only to falter and sway; their trailing hems turn into a heavy burden, bringing them low in dismay.”

— नज़्म तबातबाई
अर्थ

वे तीतर और चकोर की चाल का मज़ाक उड़ाकर उठे मगर खुद ही लड़खड़ा रहे हैं; उनके अपने पाँयचे एक भारी बोझ बनकर उन्हें ही ज़लील कर रहे हैं।

विस्तार

उर्दू शायरी में तदर्रौ (तीतर) और कबक (चकोर) अपनी नज़ाकत भरी और मदमस्त चाल के लिए मशहूर हैं। शायर तंज़ कसते हुए कहता है कि जो लोग दूसरों की कुदरती अदाओं का मज़ाक उड़ाकर अपनी शान दिखाने उठते हैं, वे ख़ुद लड़खड़ा जाते हैं। उनका लंबा और दिखावटी लिबास, जिसे वे बड़प्पन समझते थे, उनके पैरों में भारी बोझ बनकर उलझ जाता है और उन्हें ज़लील व हल्का कर देता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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