ग़ज़ल
जुनूँ के वलवले जब घुट गए दिल में निहाँ हो कर
جنوں کے ولولے جب گھٹ گئے دل میں نہاں ہو کر
यह ग़ज़ल दमित भावनाओं, जुनून की असीम तीव्रता और आत्मिक उत्थान की गाथा है। जब दिल में दबा हुआ उन्माद बाहर फूटता है, तो वह धुएँ और बिजली का रूप ले लेता है, और यह बेपनाह सफ़र आसमानों को भी पीछे छोड़ते हुए ला-मकाँ की ओर बढ़ जाता है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
जुनूँ के वलवले जब घुट गए दिल में निहाँ हो कर
तो उट्ठे हैं धुआँ हो कर गिरे हैं बिजलियाँ हो कर
जब दीवानगी के जज़्बात दिल में छुपकर घुट गए, तो वे धुएँ की तरह ऊपर उठे और बिजलियाँ बनकर नीचे गिरे।
2
कुछ आगे बढ़ चले सामान-ए-राहत ला-मकाँ हो कर
फ़लक पीछे रहा जाता है गर्द-ए-कारवाँ हो कर
हमारे सुकून और राहत के साधन सीमाओं से परे होकर बहुत आगे निकल गए हैं, और आसमान हमारे क़ाफ़िले की धूल बनकर पीछे छूटता जा रहा है।
3
किसी दिन तो चले ऐ आसमाँ बाद-ए-मुराद ऐसी
कि उतरें कश्ती-ए-मय पर घटाएँ बादबाँ हो कर
ऐ आसमान, किसी दिन तो मुरादों की ऐसी अनुकूल हवा चले कि काले बादल शराब की कश्ती पर पाल बनकर उतर आएँ।
4
न जाने किस बयाबाँ मर्ग ने मिट्टी नहीं पाई
बगूले जा रहे हैं कारवाँ-दर-कारवाँ हो कर
न जाने जंगल या रेगिस्तान में मरने वाले किस अभागे को मिट्टी (दफ़न) नसीब नहीं हुई, कि बगूले क़ाफ़िला दर क़ाफ़िला बनकर चले जा रहे हैं।
5
वफ़ूर-ए-ज़ब्त से बेताबी-ए-दिल बढ़ नहीं सकती
गले तक आ के रह जाते हैं नाले हिचकियाँ हो कर
अत्यधिक आत्म-नियंत्रण (ज़ब्त) के कारण दिल की बेताबी और अधिक नहीं बढ़ पाती, और दर्द भरी चीख़ें गले तक आकर केवल हिचकियाँ बनकर रह जाती हैं।
6
गुलू-गीर अब तो ऐसा इंक़लाब-ए-रंग-ए-आलम है
कि नग़्मे निकले मिन्क़ार-ए-अनादिल से फ़ुग़ाँ हो कर
दुनिया के हालात का बदलाव अब इस कदर दमघोंटू हो गया है कि बुलबुलों की चोंच से उनके तराने भी चीख़ और मातम बनकर निकल रहे हैं।
7
जो हो कर अब्र से मायूस ख़ुद सींचे कभी दहक़ाँ
जला दें खेत को पानी की लहरें बिजलियाँ हो कर
यदि किसान बादलों से निराश होकर कभी स्वयं अपनी खेती को सींचे, तो पानी की लहरें ही बिजलियाँ बनकर उसके खेत को जला देती हैं।
8
जहाँ में वाशुद-ए-ख़ातिर के सामाँ हो गए लाशे
जगह राहत की ना-मुम्किन हुई है ला-मकाँ हो कर
इस दुनिया में दिल को बहलाने और खुश करने के सारे साधन लाश बन चुके हैं, और चैन-ओ-सुकून की जगह स्थान-रहित (ला-मकां) होकर बिल्कुल नामुमकिन हो गई है।
9
हँसे कोई न बिजली के सिवा इस दार-ए-मातम में
अगर रह जाए सारा खेत किश्त-ए-ज़ाफ़राँ हो कर
इस मातम के घर में बिजली के सिवा कोई न हँसे, चाहे सारा खेत केसर की क्यारी ही क्यों न बन जाए।
10
अलम में आशियाँ के इस क़दर तिनके चुने मैं ने
कि आख़िर बाइस-ए-तस्कीं हुए हैं आशियाँ हो कर
अपने घोंसले के ग़म में मैंने इतने तिनके जमा किए कि आख़िरकार वे खुद एक घोंसला बनकर मेरे सुकून का जरिया बन गए।
11
घटाएँ घिर के क्या क्या हसरत-ए-फ़रहाद पर रोईं
चमन तक आ गईं नहरें पहाड़ों से रवाँ हो कर
फ़रहाद की अधूरी हसरत पर घिरकर आई घटाएँ इस कदर रोईं कि पहाड़ों से बहती हुई नहरें बाग़ तक पहुँच गईं।
12
दिल-ए-शैदा ने पाया इश्क़ में मेराज का रुत्बा
यहाँ अक्सर बुतों के ज़ुल्म टूटे आसमाँ हो कर
आशिक दिल ने प्रेम में मेराज (सर्वोच्च शिखर) का दर्जा पा लिया, जहाँ महबूबों के सितम अक्सर आसमान बनकर उस पर टूटे।
13
जो डरते डरते दिल से एक हर्फ़-ए-शौक़ निकला था
वो उस के सामने आया ज़बाँ पर दास्ताँ हो कर
दिल से प्यार का जो एक शब्द बड़ी हिचकिचाहट और डर के साथ निकला था, महबूब के सामने आते ही वह ज़ुबान पर एक लंबी दास्तान बनकर आ गया।
14
निकल आए हैं हर इक़रार में इंकार के पहलू
बना देती हैं हैराँ तेरी बातें मक्र याँ हो कर
तुम्हारे हर इक़रार में इनकार के पहलू नज़र आने लगे हैं, और तुम्हारी बातें यहाँ फ़रेब बनकर मुझे हैरान कर देती हैं।
15
नज़ाकत का ये आलम फूल भी तोड़े तो बल खा कर
न जाने दिल मिरा किस तरह तोड़ा पहलवाँ हो कर
उनकी नज़ाकत का यह आलम है कि एक फूल तोड़ते हुए भी वे लचक जाते हैं, न जाने कैसे उन्होंने किसी पहलवान की तरह मेरा दिल तोड़ दिया।
16
तदर्रौ-ओ-कबक पर हँस कर उठ्ठे ख़ुद लड़खड़ाते हैं
सुबुक करते हैं उन को पाएँचे बार-ए-गिराँ हो कर
वे तीतर और चकोर की चाल का मज़ाक उड़ाकर उठे मगर खुद ही लड़खड़ा रहे हैं; उनके अपने पाँयचे एक भारी बोझ बनकर उन्हें ही ज़लील कर रहे हैं।
17
गला घोंटा है ज़ब्त-ए-ग़म ने कुछ ऐसा कि मुश्किल है
कि निकले मुँह से आवाज़-ए-शिकस्त-ए-दिल फ़ुग़ाँ हो कर
ग़म को दबाने की कोशिश ने गला इस तरह घोंट दिया है कि दिल के टूटने की आवाज़ भी फ़रियाद या चीख़ बनकर मुँह से बाहर नहीं निकल पा रही है।
18
पता अंदेशा-ए-सालिक ने पाया मंज़िल-ए-दिल का
तू पल्टा ला-मकाँ से आसमाँ-दर-आसमाँ हो कर
साधक के विचार ने दिल की मंज़िल का पता तब पाया, जब तू ला-मकाँ (स्थान-रहित दुनिया) से एक-एक आसमान पार करते हुए वापस लौटा।
19
हुई फिर देखिए आ बुस्तन-ए-शादी-ओ-ग़म दुनिया
अभी पैदा हुए थे रंज-ओ-राहत तो अमाँ हो कर
देखिए, यह दुनिया फिर से ख़ुशी और ग़م से गर्भवती हो गई है, जबकि अभी कुछ ही देर पहले रंज और राहत जुड़वाँ बनकर पैदा हुए थे।
20
जो निकली होगी कोई आरज़ू तो ये भी निकलेगा
तुम्हारा तीर-ए-हसरत बन गया दिल में निहाँ हो कर
तुम्हारा तीर दिल में छुपकर अब एक हसरत बन चुका है। अगर कभी दिल से कोई और इच्छा बाहर निकलेगी, तो यह भी उसी के साथ बाहर आ जाएगा।
21
उतर जाएगा तू ओ आफ़्ताब-ए-हुस्न कोठे से
गिरेगा साया-ए-दीवार हम पर आसमाँ हो कर
ऐ हुस्न के सूरज, जब तू छत से नीचे उतर जाएगा, तो दीवार का साया हम पर आसमान बनकर गिरेगा।
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