लाई हुबाब तक को सैल-ए-फ़ना बहा कर इक आह खींचने को इक दम की ज़िंदगी में

“The deluge of mortality swept even the bubble along—granting a life of merely a breath, just to heave a single sigh.”

— नज़्म तबातबाई
अर्थ

विनाश का सैलाब एक बुलबुले तक को एक सांस की ज़िंदगी में बहा कर ले आया, सिर्फ़ इसलिए ताकि वह एक आह भर सके।

विस्तार

मीर साहब ने इस शेर में ज़िंदगी की नश्वरता को पानी के बुलबुले (हुबाब) के ज़रिये बेहद ख़ूबसूरती से बयां किया है। मौत और वक़्त का सैलाब इतना तेज़ है कि उसमें बुलबुले जैसी नाज़ुक चीज़ भी बहती चली जाती है, जिसे बस एक सांस भर की ज़िंदगी मिली है। शायर का ख्याल यह है कि बुलबुला शायद बना ही इसलिए था कि हवा की वो अकेली सांस बनकर सिर्फ़ एक दर्द भरी आह भर सके और फ़ौरन मिट जाए।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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