ग़ज़ल
क्या कारवान-ए-हस्ती गुज़रा रवा-रवी में
کیا کاروان ہستی گزرا روا روی میں
यह ग़ज़ल जीवन के तीव्र और अनिश्चित सफ़र, समय के गुज़रने तथा आंतरिक वेदना का मार्मिक चित्रण करती है। इसमें शायर ने बाहरी हँसी और बहार के पीछे छिपे गहरे दिल के ज़ख़्मों और अस्तित्व की नश्वरता को बड़ी संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
क्या कारवान-ए-हस्ती गुज़रा रवा-रवी में
फ़र्दा को मैं ने देखा गर्द-ओ-ग़ुबार-ए-दी में
जिंदगी का कारवां इतनी आपाधापी और तेज़ी से गुज़र गया कि मुझे आने वाला कल बीते हुए कल की उड़ती धूल में नज़र आया।
2
थे महव लाला-ओ-गुल किस कैफ़-ए-बे-ख़ुदी में
ज़ख़्म-ए-जिगर के टाँके टूटे हँसी हँसी में
लाला और गुलाब बेखुदी के ऐसे नशे में डूबे हुए थे कि हँसी-मज़ाक में ही दिल के ज़ख्मों के सारे टाँके टूट गए।
3
यारान-ए-बज़्म-ए-इशरत ढूँडूँ कहाँ मैं तुम को
तारों की छाँव में या पिछले की चाँदनी में
ऐ ख़ुशी की महफ़िल के साथियो, मैं तुम्हें कहाँ ढूँढूँ—तारों की छाँव में या रात के पिछले पहर की चाँदनी में?
4
हर उक़्दा में जहाँ के पोशीदा है कशाकश
है मौज-ए-ख़ंदा-ए-गुल पिन्हाँ कली कली में
इस दुनिया की हर उलझन या गाँठ में एक कशमकश और खिंचाव छुपा हुआ है, ठीक वैसे ही जैसे हर कली के अंदर फूल के खिलने और मुस्कुराने की उमंग छिपी होती है।
5
ज़ख़्मों में ख़ुद चमक है और उस पे ये सितम है
रंग-ए-परीदा से मैं रहता हूँ चाँदनी में
मेरे ज़ख़्मों में पहले से ही अपनी चमक है और ज़ुल्म यह है कि मैं अपने फ़क़ या उड़े हुए चेहरे के साथ चाँदनी में रहता हूँ।
6
हम किस शुमार में थे पुर्सिश जो हम से होती
ये इम्तियाज़ पाया आशोब-ए-आगही में
हमारी ऐसी कोई हैसियत नहीं थी कि हमसे हमारा हाल पूछा जाता, यह विशेष दर्जा हमने सिर्फ़ चेतना और समझ के दुख-दर्द में पाया।
7
हुक्म-ए-क़ज़ा हो जैसा सरज़द हो फ़ेअ'ल वैसा
बंदा का दख़्ल भी है फिर इस कही बदी में
जैसा भाग्य का हुक्म होता है वैसा ही कर्म मनुष्य से घटित होता है, फिर इस तथाकथित बुराई में इंसान का क्या दख़ल या अधिकार है?
8
रफ़्तार-ए-साया को है पस्त-ओ-बुलंद यकसाँ
ठोकर कभी न खाए राह-ए-फ़रोतनी में
जिस तरह साये के चलने के लिए ऊँच-नीच सब बराबर है, उसी तरह विनम्रता की राह पर चलने वाला कभी ठोकर नहीं खाता।
9
वज्द आ गया फ़लक को ग़श आ गया ज़मीं को
दो तरह के असर थे इक सौत-ए-सरमदी में
उस एक शाश्वत स्वर के दो तरह के प्रभाव थे; उससे आकाश पर परमानंद छा गया और धरती बेहोश हो गई।
10
ताबीर उस की शायद एक वापसीं नफ़स हो
जो ख़्वाब देखते थे हम सारी ज़िंदगी में
जो ख़्वाब हम पूरी ज़िंदगी देखते रहे, शायद उसकी ताबीर (परिणाम) सिर्फ़ एक आख़िरी सांस ही हो।
11
लाई हुबाब तक को सैल-ए-फ़ना बहा कर
इक आह खींचने को इक दम की ज़िंदगी में
विनाश का सैलाब एक बुलबुले तक को एक सांस की ज़िंदगी में बहा कर ले आया, सिर्फ़ इसलिए ताकि वह एक आह भर सके।
12
महशर की आफ़तों का धड़का नहीं रहा अब
सौ हश्र मैं ने देखे दो दिन की ज़िंदगी में
अब मुझे क़यामत की मुसीबतों का कोई डर नहीं रहा, क्योंकि मैंने इस दो दिन की ज़िंदगी में ही सौ क़यामतें देख ली हैं।
13
पहलू में तू हो ऐ दिल फिर हसरतें हज़ारों
किस बात की कमी है तेरी सलामती में
ऐ दिल, जब तू मेरे पहलू में मौजूद है तो फिर हज़ारों ख़्वाहिशें क्यों हैं? तेरी सलामती के रहते हुए भला किस बात की कमी है?
14
पुर्सान-ए-हाल वो हो और सामने बुला कर
क्या जानिए ज़बाँ से क्या निकले बे-ख़ुदी में
अगर महबूब मुझे अपने सामने बुलाकर मेरा हाल-चाल पूछे, तो पता नहीं कि उस बेसुधी के आलम में मेरी ज़बान से क्या निकल जाए।
15
तू एक ज़िल्ल-ए-हस्ती फिर कैसी ख़ुद-परस्ती
साया की परवरिश है दामान-ए-बे-ख़ुदी में
तुम केवल अस्तित्व की एक परछाईं मात्र हो, फिर यह आत्म-पूजा और अहंकार कैसा? किसी साये का पालन-पोषण तो केवल बेख़ुदी (आत्म-विस्मृति) के आंचल में ही होता है।
16
हाएल बस इक नफ़स है महशर में और हम में
पर्दा हबाब का है फ़र्दा में और दी में
क़यामत और हमारे बीच बस एक ही साँस की रुकावट है, और आने वाले कल और बीते हुए कल के बीच का पर्दा पानी के बुलबुले जितना नाज़ुक है।
17
आँखें दिखा रही है दिन से मुझे शब-ए-ग़म
आसार तीरगी के हैं दिन की रौशनी में
ग़म की रात मुझे दिन से ही आँखें दिखा रही है, और दिन के उजाले में भी अंधेरे के आसार नज़र आ रहे हैं।
18
तू ने तो अपने दर से मुझ को उठा दिया है
परछाईं फिर रही है मेरी उसी गली में
तुमने मुझे अपने दरवाजे से तो दूर कर दिया है, लेकिन मेरी परछाईं अब भी उसी गली में भटक रही है।
19
सज्दा का हुक्म मुझ को तू ने तो अब दिया है
पहले ही लिख चुका हूँ मैं ख़त्त-ए-बंदगी में
तूने मुझे सजदा करने का हुक्म तो अब दिया है, जबकि अपनी बंदगी और आजिज़ी के इक़रारनामे में यह बात मैं पहले ही लिख चुका हूँ।
20
ऐ 'नज़्म' छेड़ कर हम तुझ को हुए पशेमाँ
क्या जानते थे ज़ालिम रो देगा दिल-लगी में
ऐ नज़्म, हम तुम्हें छेड़ कर बहुत पछता रहे हैं; हमें क्या मालूम था कि तुम मज़ाक-मज़ाक में ही रो पड़ोगे।
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