महशर की आफ़तों का धड़का नहीं रहा अब सौ हश्र मैं ने देखे दो दिन की ज़िंदगी में

“No longer do I fear the terrors of the Judgment Day; a hundred doomsdays I have seen in this brief, two-day stay.”

— नज़्म तबातबाई
अर्थ

अब मुझे क़यामत की मुसीबतों का कोई डर नहीं रहा, क्योंकि मैंने इस दो दिन की ज़िंदगी में ही सौ क़यामतें देख ली हैं।

विस्तार

शायर यहाँ दिल के उस दर्द को बयां कर रहे हैं, जो इंसान को हर बड़े डर से बेपरवाह कर देता है। वे कहते हैं कि इस छोटी सी दो दिन की ज़िंदगी में उन्होंने इतने ग़म और क़यामतें झेली हैं कि अब उन्हें आख़िरत यानी प्रलय के दिन का कोई ख़ौफ़ नहीं बचा। यह उस थके हुए लेकिन हौसलामंद दिल की आवाज़ है जो ज़माने के इम्तिहानों से तपकर इतना निडर हो चुका है कि मौत के बाद का हश्र भी उसे मामूली लगता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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