“As destiny decrees it, so the deed must unfold; what hand has mortal man in the evil of which we're told?”
जैसा भाग्य का हुक्म होता है वैसा ही कर्म मनुष्य से घटित होता है, फिर इस तथाकथित बुराई में इंसान का क्या दख़ल या अधिकार है?
शायर यहाँ क़िस्मत और इंसान के बस के बीच के पुराने द्वंद्व को बड़ी सादगी से छू रहे हैं। उनका कहना है कि जब हर काम पहले से तय तक़दीर के इशारे पर ही होता है, तो फिर किसी बुराई या गुनाह का इल्ज़ाम बेचारे इंसान के सिर क्यों मढ़ा जाए? यह शेर हमें एक बेबस कठपुतली की तरह खड़े इंसान की उलझन दिखाता है, जो नियति के आगे लाचार होकर भी अपनी ही बनाई दुनिया का मुजरिम ठहरा दिया जाता है।
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