“To the shadow's pace, the high and low are one and the same; one never stumbles who walks upon the path of humility.”
जिस तरह साये के चलने के लिए ऊँच-नीच सब बराबर है, उसी तरह विनम्रता की राह पर चलने वाला कभी ठोकर नहीं खाता।
ज़रा किसी परछाईं को देखिए, ज़मीन चाहे ऊँची हो या नीची, वह बिना किसी रुकावट के बहती चली जाती है और उसे कभी ठोकर नहीं लगती। शायर ने यहाँ साये की इसी सहज गति को आजिज़ी और विनम्रता (फ़रोतनी) का खूबसूरत प्रतीक बनाया है। जो इंसान अपने भीतर से अहंकार को मिटाकर ज़मीन से जुड़ा रहता है, ज़िंदगी के ऊँच-नीच उसे कभी विचलित नहीं कर पाते और वह बिना गिरे अपना सफ़र तय कर लेता है।
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