“Since the dawn of pre-eternity, I have been numbered among your singers; the nightingale of Heaven's farthest lote-tree taught me the art of lament.”
सृष्टि के आरंभ (अज़ल की सुबह) से ही मैं तुम्हारी प्रशंसा के गीत गाने वालों में शामिल हूँ, और सिदरा के बुलबुल (जिब्रील) ने मुझे फ़रियाद करने का सलीका सिखाया है।
इस ख़ूबसूरत शेर में शायर अपने इश्क़ और अपनी शायरी को कायनात की शुरुआत यानी 'अज़ल' से जोड़ता है। वह महबूब से कहता है कि मैं तो सृष्टि के पहले दिन से ही तेरी तारीफ़ के तराने गा रहा हूँ, और विरह में तड़पने का यह सलीक़ा मुझे किसी आम इंसान ने नहीं, बल्कि अर्श के फ़रिश्ते (बुलबुल-ए-सिदरा) ने सिखाया है। यहाँ शायर अपनी पुकार और अपने दर्द को महज़ सांसारिक न बताकर रूहानी और पाकीज़ा मक़ाम अता करता है।
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