ग़ज़ल

नदामत है बना कर इस चमन में आशियाँ मुझ को

ندامت ہے بنا کر اس چمن میں آشیاں مجھ کو
नज़्म तबातबाई· Ghazal· 11 shers· radif: मुझ को

इस ग़ज़ल में शायर दुनिया रूपी चमन में अपना बसेरा बनाने पर पछतावा व्यक्त करता है, जहाँ उसे कोई सच्चा हमदम या हम-ज़बाँ नहीं मिला। वह ज़िंदगी के अकेलेपन और उम्र की तेज़ रफ़्तारी के बीच सांसारिक मोह-माया की व्यर्थता को गहराई से रेखांकित करता है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
नदामत है बना कर इस चमन में आशियाँ मुझ को मिला हमदम यहाँ कोई न कोई हम-ज़बाँ मुझ को
मुझे इस बाग़ में अपना आशियाना बनाने पर पछतावा है, क्योंकि यहाँ मुझे न तो कोई साथी मिला और न ही कोई अपनी बात समझने वाला हमज़बाँ मिला।
2
दिखाए जा रवानी तौसन-ए-उम्र-ए-रवाँ मुझ को हिलाल-ए-बर्क़ से रख हम-रिकाब-ओ-हम-इनाँ मुझ को
हे गुज़रती ज़िंदगी के तेज़ दौड़ते घोड़े, मुझे अपनी तीव्र गति दिखाते रहो और मुझे बिजली की चमक के साथ-साथ चलने वाला बनाए रखो।
3
बनाया ना-तवानी ने सुलैमान-ए-ज़माँ मुझ को उड़ा कर ले चले मौज-ए-नसीम-ए-बोस्ताँ मुझ को
मेरी अत्यधिक कमज़ोरी ने मुझे इस ज़माने का सुलेमान बना दिया है, क्योंकि बाग़ की मंद हवा का एक झोंका भी मुझे उड़ाकर ले जाता है।
4
दम-ए-सुब्ह-ए-अज़ल से मैं नवा-संजों में हूँ तेरे बताया बुलबुल-ए-सिदरा ने अंदाज़-ए-फ़ुग़ाँ मुझ को
सृष्टि के आरंभ (अज़ल की सुबह) से ही मैं तुम्हारी प्रशंसा के गीत गाने वालों में शामिल हूँ, और सिदरा के बुलबुल (जिब्रील) ने मुझे फ़रियाद करने का सलीका सिखाया है।
5
मिरी बातों में क्या मालूम कब सोए वो कब जागे सिरे से इस लिए कहनी पड़ी फिर दास्ताँ मुझ को
मेरी बातों के दौरान पता नहीं वे कब सो गए और कब जागे, इसी वजह से मुझे अपनी पूरी दास्तान फिर से शुरू से सुनानी पड़ी।
6
बहा कर क़ाफ़िला से दूर जिस्म-ए-ज़ार को फेंका कि मौज-ए-सैल थी बाँग-ए-दरा-ए-कारवाँ मुझ को
क़ाफ़िले की घंटी की आवाज़ मेरे लिए सैलाब की लहर बन गई, जिसने मेरे कमज़ोर शरीर को बहाकर क़ाफ़िले से बहुत दूर फेंक दिया।
7
ये दिल की बे-क़रारी ख़ाक हो कर भी न जाएगी सुनाती है लब-ए-साहिल से ये रेग-ए-रवाँ मुझ को
दिल की यह बेचैनी मिट्टी में मिल जाने के बाद भी ख़त्म नहीं होगी, किनारे पर बहती हुई यह रेत मुझे यही बात सुनाती है।
8
उड़ाई ख़ाक जिस सहरा में तेरे वास्ते मैं ने थका-माँदा मिला इन मंज़िलों में आसमाँ मुझ को
जिस रेगिस्तान में मैंने तुम्हारे लिए ख़ाक उड़ाई (भटकता रहा), उन पड़ावों पर मुझे आसमान भी थका-माँदा मिला।
9
तसव्वुर शम्अ का जिस को जिला दे हूँ वो परवाना लग उट्ठी आग दिल में जब नज़र आया धुआँ मुझ को
मैं वह पतंगा हूँ जिसे शमा का महज़ ख़याल ही जला देता है; जैसे ही मुझे कहीं धुआँ दिखाई दिया, मेरे दिल में आग भड़क उठी।
10
वो जिस आलम में जा पहुँचा वहाँ मैं किस तरह जाऊँ हुआ दिल आप से बाहर पिन्हा कर बेड़ियाँ मुझ को
दिल मुझे बेड़ियों में जकड़कर खुद अपने आपे से बाहर हो गया है, अब वह जिस दुनिया में पहुँच चुका है, वहाँ मैं कैसे जा सकता हूँ?
11
ग़ुबार-ए-राह से ऐ 'नज़्म' ये आवाज़ आती है गई ऐ उम्र-ए-रफ़्ता तू किधर फेंका कहाँ मुझ को
ऐ 'नज़्म', रास्ते की धूल से यह आवाज़ सुनाई देती है कि ऐ बीती हुई ज़िंदगी, तू किधर चली गई और मुझे किस हाल में कहाँ लाकर फेंक दिया?
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