“Even turned to dust, this heart’s unrest will never fade away / So whispers the drifting sand to me from the water's edge.”
दिल की यह बेचैनी मिट्टी में मिल जाने के बाद भी ख़त्म नहीं होगी, किनारे पर बहती हुई यह रेत मुझे यही बात सुनाती है।
शायर समंदर के किनारे बहती और बिखरती रेत को देखकर दिल की एक गहरी दास्तान बयां कर रहे हैं। जिस तरह साहिल की रेत लहरों के थपेड़ों में कभी ठहर नहीं पाती और मुसलसल बेचैन रहती है, ठीक वैसे ही शायर को लगता है कि ख़ाक बन जाने के बाद भी दिल का यह तड़पना थमेगा नहीं। यह शेर उस बेक़रारी की तस्वीर खींचता है, जिसे मौत की ख़ामोशी भी सुकून नहीं दे सकती।
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