“Far from the caravan it swept and cast my wasted frame; for like a surging flood to me, the caravan's bell became.”
क़ाफ़िले की घंटी की आवाज़ मेरे लिए सैलाब की लहर बन गई, जिसने मेरे कमज़ोर शरीर को बहाकर क़ाफ़िले से बहुत दूर फेंक दिया।
क़ाफ़िले की घंटी (बाँग-ए-दरा) की आवाज़ आमतौर पर मुसाफ़िरों को साथ चलने और राह दिखाने का बुलावा देती है। लेकिन शायर का दिल और कमज़ोर वजूद (जिस्म-ए-ज़ार) रंज-ओ-ग़म से इतना टूटा हुआ है कि यह पुकार उसे सहारा देने के बजाय सैलाब की एक तूफ़ानी लहर बन कर आई और क़ाफ़िले से भी दूर बहा ले गई। यह शेर उस बेबसी को दिखाता है जहाँ अपनों के साथ की पुकार भी इंसान को जोड़ने के बजाय और ज़्यादा तन्हा कर देती है।
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