इसी उमीद पे हम दिन ख़िज़ाँ के काटते हैं कभी तो बाद-ए-बहार आएगी चमन की तरफ़

“On this sole hope we endure autumn's barren days, / That someday the breeze of spring will turn toward the garden.”

— नज़्म तबातबाई
अर्थ

हम पतझड़ के दिन इसी उम्मीद के सहारे काट रहे हैं कि किसी दिन तो बसंत की हवा बाग़ की तरफ़ ज़रूर आएगी।

विस्तार

यह शेर इंसान के सब्र और उम्मीद की खूबसूरत तासीर को बयां करता है। यहाँ 'ख़िज़ाँ' (पतझड़) ज़िंदगी के मुश्किल दौर, उदासी और तन्हाई की निशानी है, जबकि 'बाद-ए-बहार' खुशियों और राहत के लौटने का प्रतीक है। शायर समझाते हैं कि इंसान बड़े से बड़ा ग़म भी सिर्फ़ इस यकीन के सहारे काट लेता है कि एक दिन उसके वीरान जीवन में खुशियों की बहार ज़रूर दस्तक देगी।

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