ग़ज़ल

फिरी हुई मिरी आँखें हैं तेग़-ज़न की तरफ़

پھری ہوئی مری آنکھیں ہیں تیغ زن کی طرف
नज़्म तबातबाई· Ghazal· 16 shers· radif: की तरफ़

यह ग़ज़ल प्रेम में उपेक्षा, आत्म-समर्पण और विरह की गहरी पीड़ा को दर्शाती है। प्रेमी अपने क़ातिल महबूब के प्रति पूरी तरह समर्पित है, फिर भी महबूब की बेरुखी और ध्यान का भटकना उसे आहत करता है। इसमें एकांत, आत्म-विनाश और अनकहे दर्द का भावपूर्ण चित्रण हुआ है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
फिरी हुई मिरी आँखें हैं तेग़-ज़न की तरफ़ चला है छोड़ के बिस्मिल मुझे हिरन की तरफ़
मेरी मरती हुई आँखें उस तलवार चलाने वाले की ओर टिकी हैं, जो मुझे घायल और तड़पता हुआ छोड़कर हिरन के शिकार की तरफ़ बढ़ गया है।
2
बनाया तोड़ के आईना आईना-ख़ाना न देखी राह जो ख़ल्वत से अंजुमन की तरफ़
जब मुझे तन्हाई से महफ़िल की तरफ़ जाने का कोई रास्ता नहीं दिखा, तो मैंने आईना तोड़कर आईना-ख़ाना बना लिया।
3
रह-ए-वफ़ा को न छोड़ा वो अंदलीब हूँ मैं छुटा क़फ़स से तो पर्वाज़ की चमन की तरफ़
मैं वह बुलबुल हूँ जिसने वफ़ा का रास्ता कभी नहीं छोड़ा; जैसे ही मैं पिंजरे से आज़ाद हुआ, मैंने सीधे बाग़ की तरफ़ उड़ान भरी।
4
गुरेज़ चाहिए तूल-ए-अमल से सालिक को सुना है राह ये जाती है राहज़न की तरफ़
साधक को लंबी सांसारिक इच्छाओं और उम्मीदों से बचना चाहिए, क्योंकि सुना है कि यह रास्ता लुटेरे की तरफ़ जाता है।
5
सरा-ए-दहर में सोओगे ग़ाफ़िलो कब तक उठो तो क्या तुम्हें जाना नहीं वतन की तरफ़
हे लापरवाह लोगो, तुम इस दुनिया रूपी सराय में कब तक सोते रहोगे? उठो, क्या तुम्हें अपने असली वतन की ओर वापस नहीं जाना है?
6
जो अहल-ए-दिल हैं अलग हैं वो अहल-ए-ज़ाहिर से न मैं हूँ शैख़ की जानिब न बरहमन की तरफ़
दिल वाले लोग केवल बाहरी दिखावे पर चलने वालों से अलग होते हैं, इसलिए मैं न तो शैख़ की तरफ़ हूँ और न ही ब्राह्मण की तरफ़।
7
जहान-ए-हादसा-आगीन में बशर का वरूद गुज़र हबाब का दरिया-ए-मौजज़न की तरफ़
हादसों से भरी इस दुनिया में इंसान का जन्म लेना ठीक वैसा ही है जैसे किसी नाज़ुक बुलबुले का तूफ़ानी लहरों वाले दरिया की ओर जाना।
8
इसी उमीद पे हम दिन ख़िज़ाँ के काटते हैं कभी तो बाद-ए-बहार आएगी चमन की तरफ़
हम पतझड़ के दिन इसी उम्मीद के सहारे काट रहे हैं कि किसी दिन तो बसंत की हवा बाग़ की तरफ़ ज़रूर आएगी।
9
बिछड़ के तुझ से मुझे है उमीद मिलने की सुना है रूह को आना है फिर बदन की तरफ़
तुमसे बिछड़ कर भी मुझे फिर से मिलने की उम्मीद है, क्योंकि मैंने सुना है कि रूह को एक दिन दोबारा बदन की तरफ लौटना होता है।
10
गवाह कौन मिरे क़त्ल का हो महशर में अभी से सारा ज़माना है तेग़-ज़न की तरफ़
क़यामत के दिन मेरे क़त्ल की गवाही कौन देगा, जब अभी से ही पूरी दुनिया तलवार चलाने वाले यानी क़ातिल के पक्ष में है।
11
ख़बर दी उठ के क़यामत ने उस के आने की ख़ुदा ही ख़ैर करे रुख़ है अंजुमन की तरफ़
क़यामत ने उठकर उसके आने की ख़बर दी है, अब ख़ुदा ही ख़ैर करे क्योंकि उसका रुख़ महफ़िल की तरफ़ है।
12
वो अपने रुख़ की सबाहत को आप देखते हैं झुके हुए गुल-ए-नर्गिस हैं यासमन की तरफ़
वे खुद अपने चेहरे की चमक और सुंदरता को देख रहे हैं, मानो नर्गिस के फूल चमेली की तरफ झुके हुए हों।
13
तमाम बज़्म है क्या महव उस की बातों में नज़र दहन की तरफ़ कान है सुख़न की तरफ़
पूरी महफ़िल उनकी बातों में इस कदर मग्न है कि हर किसी की नज़र उनके होंठों की तरफ़ है और कान उनकी बातों की ओर लगे हुए हैं।
14
असीर हो गया दिल गेसुओं में ख़ूब हुआ चला था डूब के मरने चह-ए-ज़क़न की तरफ़
यह अच्छा ही हुआ कि दिल ज़ुल्फ़ों में क़ैद हो गया, वर्ना वह तो ठोड़ी के गड्ढे में डूब कर मरने जा रहा था।
15
ये मय-कशों की अदा अब्र-ए-तर भी सीख गए किनार-ए-जू से जो उठ्ठे चले चमन की तरफ़
पानी से भरे बादल भी शराबियों का तौर-तरीका सीख गए हैं; जैसे ही वे नदी के किनारे से उठते हैं, सीधे बाग़ की तरफ़ चल पड़ते हैं।
16
ज़हे-नसीब जो हो कर्बला की मौत ऐ 'नज़्म' कि उड़ के ख़ाक-ए-शिफ़ा आए ख़ुद कफ़न की तरफ़
ऐ नज़्म, यह कितनी बड़ी ख़ुशक़िस्मती होगी अगर कर्बला में मौत हासिल हो, ताकि शिफ़ा देने वाली मुक़द्दस मिट्टी ख़ुद उड़कर कफ़न की तरफ़ आ जाए।
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