रोज़-ए-सियह में साथ कोई दे तो जानिए जब तक फ़रोग़-ए-शम्अ है परवाना साथ है

“True companionship is known if someone stands by in dark days; the moth remains beside the candle only as long as its flame shines bright.”

— नज़्म तबातबाई
अर्थ

सच्चा साथ तो तब माना जाए जब कोई बुरे या कठिन दिनों में साथ दे, क्योंकि परवाना भी शमा के साथ तभी तक रहता है जब तक उसकी लौ चमकती है।

विस्तार

शायर यहाँ इंसानी ताल्लुक़ात की एक कड़वी हक़ीक़त को शम्अ और परवाने के ख़ूबसूरत रूपक से समझा रहे हैं। हम परवाने की वफ़ा की दाद देते हैं, मगर हक़ीक़त यह है कि वह भी तब तक ही चक्कर काटता है जब तक शम्अ में चमक और रौशनी बाक़ी होती है। असली मुहब्बत और हमदर्दी की पहचान उजालों और ख़ुशहाली में नहीं, बल्कि ज़िंदगी के बुरे और तंग दिनों में साथ निभाने से होती है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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