क़रार इक दम नहीं आता है ख़ून-ए-बे-गुनह पी कर कि अब तो ख़ुद ब-ख़ुद तलवार रह रह कर उगलती है

“Having drunk the blood of the innocent, it finds not a moment of peace; for now, of its own accord, the sword repeatedly vomits it back out.”

— नज़्म तबातबाई
अर्थ

बेगुनाह का ख़ून पीने के बाद एक पल भी चैन नहीं मिलता, क्योंकि अब तलवार ख़ुद-ब-ख़ुद बार-बार उसे उगल रही है।

विस्तार

इस शेर में शायर ने तलवार का मानवीकरण करते हुए ज़ुल्म और बेगुनाही का गहरा दर्द बयां किया है। बेकसूर का ख़ून बहाने के बाद ज़ालिम का हथियार भी चैन नहीं पाता; वह गुनाह इतना भारी है कि तलवार उसे हज़म नहीं कर पाती और बार-बार उगल देती है। यह ख़ूबसूरत तस्वीर हमें याद दिलाती है कि बेगुनाहों पर ढाया गया सितम कभी छुपता नहीं, बल्कि उसकी गूँज हमेशा इंसाफ़ मांगती रहती है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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