ग़ज़ल
उड़ा कर काग शीशे से मय-ए-गुल-गूँ निकलती है
اڑا کر کاگ شیشہ سے مے گلگوں نکلتی ہے
यह ग़ज़ल मयख़ाने की जीवंत, उल्लासपूर्ण रौनक और वसंत के मदमस्त आगमन का जश्न मनाती है। इसमें सुरा-प्रेमियों की बेपरवाह खुशी, शराब के दौर और मतवाली घटाओं व हवाओं के सुरूर का दिलकश चित्रण किया गया है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
उड़ा कर काग शीशे से मय-ए-गुल-गूँ निकलती है
शराबी जम्अ हैं मय-ख़ाना में टोपी उछलती है
बोतल से काग (ढक्कन) हटाते ही गुलाबी रंग की शराब बाहर निकलती है; मयखाने में शराबी इकट्ठे हैं और खुशी के मारे टोपियाँ उछल रही हैं।
2
बहार-ए-मय-कशी आई चमन की रुत बदलती है
घटा मस्ताना उठती है हवा मस्ताना चलती है
शराब पीने का मौसम आ गया है और बाग की ऋतु बदल रही है; मतवाली घटाएं उठ रही हैं और मदहोश हवा चल रही है।
3
ज़-ख़ुद-रफ़्ता तबीअत कब सँभाले से सँभलती है
न बन आती है नासेह से न कुछ वाइज़ की चलती है
बेखुद और बेकाबू हो चुकी तबीयत संभालने से कब संभलती है; ऐसी हालत में न तो नसीहत देने वाले की कोई बात चलती है और न ही उपदेशक का कोई असर होता है।
4
ये किस की है तमन्ना चुटकियाँ लेती है जो दिल में
ये किस की आरज़ू है जो कलेजे को मसलती है
यह किसकी चाहत है जो दिल में चुटकियाँ काट रही है, और यह किसकी तमन्ना है जो कलेजे को मरोड़ और मसल रही है?
5
वो दीवाना है जो इस फ़स्ल में फ़स्दें न खुलवाए
रग-ए-हर-शाख़-ए-गुल से ख़ून की नद्दी उबलती है
वह व्यक्ति दीवाना है जो इस मौसम में अपनी फ़स्द (नस) न खुलवाए, क्योंकि फूल की हर शाखा की रग से ख़ून की नदी उबल रही है।
6
सहर होते ही दम निकला ग़श आते ही अजल आई
कहाँ हूँ मैं नसीम-ए-सुब्ह पंखा किस को झलती है
सुबह होते ही मेरे प्राण निकल गए और बेहोशी आते ही मौत आ पहुँची। अब मैं कहाँ हूँ, और यह सुबह की हवा किसे पंखा झल रही है?
7
तमत्तो एक का है एक के नुक़साँ से आलम में
कि साया फैलता जाता है जूँ जूँ धूप ढलती है
इस दुनिया में एक का लाभ दूसरे के नुक़सान से ही जुड़ा है, ठीक वैसे ही जैसे-जैसे धूप ढलती जाती है, साया फैलता जाता है।
8
बिना रक्खी है ग़म पर ज़ीस्त की ये हो गया साबित
न लपका आह का छूटेगा जब तक साँस चलती है
यह साबित हो चुका है कि ज़िंदगी की बुनियाद ही ग़म पर रखी गई है, और जब तक साँस चल रही है, आहें भरने की यह आदत कभी नहीं छूटेगी।
9
क़रार इक दम नहीं आता है ख़ून-ए-बे-गुनह पी कर
कि अब तो ख़ुद ब-ख़ुद तलवार रह रह कर उगलती है
बेगुनाह का ख़ून पीने के बाद एक पल भी चैन नहीं मिलता, क्योंकि अब तलवार ख़ुद-ब-ख़ुद बार-बार उसे उगल रही है।
10
जहन्नम की न आँच आएगी मय-ख़्वारों पे ओ वाइज़
शराब आलूदा हो जो शय वो कब आतिश में जलती है
हे उपदेशक, शराब पीने वालों तक नरक की आँच भी नहीं पहुँचेगी, क्योंकि जो चीज़ शराब में भीगी हो वह आग में भला कब जलती है।
11
न दिखलाना इलाही एक आफ़त है शब-ए-फ़ुर्क़त
न जो काटे से कटती है न जो टाले से टलती है
हे ईश्वर, किसी को भी जुदाई की रात मत दिखाना, क्योंकि यह एक ऐसी आफ़त है जो न तो बिताए बीतती है और न ही टाले टलती है।
12
ये अच्छा शुग़्ल वहशत में निकाला तू ने ऐ 'हैदर'
गरेबाँ में उलझने से तबीअत तो बहलती है
ऐ हैदर, तुमने दीवानेपन में यह अच्छा काम ढूंढ निकाला है कि गिरेबान फाड़ने में उलझने से कम से कम दिल तो बहल जाता है।
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