हर न करती है नज़ारे की मशक़ ख़त कूँ तेरे ख़त्त-ए-रैहाँ बूझ कर

“The wild gazelle perfects the art of her longing gaze, mistaking the soft down upon your cheek for fragrant sweet basil.”

— वली दकनी
अर्थ

हिरनी तुम्हारे चेहरे के ख़त (बालों) को ख़त्त-ए-रैहान समझकर लगातार तुम्हें देखने का अभ्यास करती रहती है।

विस्तार

शायर महबूब के हुस्न का बड़ा ही दिलकश और नाज़ुक मंज़र पेश कर रहे हैं। हिरनी, जो अपनी गहरी और हैरान निगाहों के लिए मशहूर है, महबूब के रुख़सार पर आए नए ख़त (मुलायम रोएँ) को मीठी और ताज़ा घास यानी 'रैहाँ' समझकर एकटक देख रही है और अपनी नज़रें जमाने की मश्क़ कर रही है। यहाँ 'ख़त्त-ए-रैहाँ' का दोहरा मज़ा है—यह महकती हुई हरियाली भी है और एक नफ़ीस सुलेख भी। यह सादगी और भोलापन असल में महबूब के कुदरती हुस्न की एक ख़ूबसूरत तारीफ़ है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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