ग़ज़ल

मैं तुझे आया हूँ ईमाँ बूझ कर

میں تجھے آیا ہوں ایماں بوجھ کر
वली दकनी· Ghazal· 7 shers· radif: बूझ कर

इस ग़ज़ल में शायर अपने महबूब के प्रति असीम समर्पण और श्रद्धा भाव प्रकट करता है, उसे अपने ईमान और आत्मिक सुकून का स्रोत मानता है। महबूब के अनुपम सौंदर्य को गुलिस्ताँ मानकर रूहानी इश्क़ और आंतरिक शांति की तलाश को संजीदगी से बयां किया गया है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
मैं तुझे आया हूँ ईमाँ बूझ कर बाइ'स-ए-जमइय्यत-ए-जाँ बूझ कर
मैं तुम्हें अपना ईमान समझकर और अपनी रूह के सुकून व इत्मीनान का जरिया मानकर तुम्हारे पास आया हूँ।
2
बुलबुल-ए-शीराज़ कूँ करता हूँ याद हुस्न कूँ तेरे गुलिस्ताँ बूझ कर
तुम्हारे हुस्न को फूलों का बाग समझकर मैं शीराज़ की बुलबुल को याद करता हूँ।
3
दिल चला है इश्क़ का हो जौहरी लब तिरे ला'ल-ए-बदख़्शाँ बूझ कर
मेरा दिल तुम्हारे होंठों को बदख़्शाँ के लाल समझकर इश्क़ का जौहरी बनने के लिए चल पड़ा है।
4
हर न करती है नज़ारे की मशक़ ख़त कूँ तेरे ख़त्त-ए-रैहाँ बूझ कर
हिरनी तुम्हारे चेहरे के ख़त (बालों) को ख़त्त-ए-रैहान समझकर लगातार तुम्हें देखने का अभ्यास करती रहती है।
5
ऐ सजन आया हूँ हो बे-इख़्तियार तुझ कूँ अपना राहत-ए-जाँ बूझ कर
हे प्रिय, मैं खुद पर बिना किसी वश के बेबस होकर तुम्हारे पास आया हूँ, तुम्हें अपनी जान का सुकून और आराम समझकर।
6
ज़ुल्फ़ तेरी क्यूँ न खाए पेच-ओ-ताब हाल मुझ दिल का परेशाँ बूझ कर
मेरे दिल की परेशान और बिखरी हुई हालत को समझकर तुम्हारी ज़ुल्फ़ें बेचैन और उलझी हुई क्यों न हों?
7
रहम कर उस पर कि आया है 'वली' दर्द-ए-दिल का तुझ कूँ दरमाँ बूझ कर
'वली' पर दया करो क्योंकि वह तुम्हें अपने दिल के दर्द का इलाज समझ कर तुम्हारे पास आया है।
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