ग़ज़ल

जब सनम कूँ ख़याल-ए-बाग़ हुआ

جب صنم کوں خیال باغ ہوا
वली दकनी· Ghazal· 5 shers· radif: हुआ

यह ग़ज़ल महबूब के सैर-ए-बाग़ के ख़याल और उनकी दिलकश अदाओं का चित्रण करती है। हर दिशा में आशिक़ों का हुजूम देखकर नाज़ुक महबूब नाज़ और गुरूर से भर जाता है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
जब सनम कूँ ख़याल-ए-बाग़ हुआ तालिब-ए-नश्शा-ए-फ़राग़ हुआ
जब महबूब के मन में बाग़ जाने का विचार आया, तो वह फ़ुरसत और बेफ़िक्री के नशे का चाहने वाला हो गया।
2
फ़ौज-ए-उश्शाक़ देख हर जानिब नाज़नीं साहिब-ए-दिमाग़ हुआ
हर तरफ आशिक़ों का हुजूम देखकर नाज़ुक महबूब मगरूर और घमंडी हो गया।
3
रश्क सूँ तुझ लबाँ की सुर्ख़ी पर जिगर-ए-लाला दाग़-दाग़ हुआ
तुम्हारे होंठों की लाली से ईर्ष्या के कारण लाला के फूल का जिगर दाग़-दाग़ हो गया।
4
दिल-ए-उश्शाक़ क्यूँ न हो रौशन जब ख़याल-ए-सनम चराग़ हुआ
आशिक़ का दिल क्यों न रोशन हो जब महबूब का ख़्याल ही एक चिराग़ बन गया है।
5
ऐ 'वली' गुल-बदन कूँ बाग़ में देख दिल-ए-सद-चाक बाग़-बाग़ हुआ
ऐ वली, बाग़ में उस फूल जैसे बदन वाले महबूब को देखकर मेरा सौ टुकड़ों में घायल दिल ख़ुशी से बाग़-बाग़ हो गया।
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