ग़ज़ल

कूचा-ए-यार ऐन कासी है

کوچۂ یار عین کاسی ہے
वली दकनी· Ghazal· 9 shers· radif: है

इस ग़ज़ल में शायर ने महबूब की गली को तीर्थ काशी के समान पावन बताते हुए अपने दिल को वहाँ का वैरागी जोगी कहा है। सूफ़ी और भारतीय आध्यात्मिक प्रतीकों के संगम से यह रचना प्रियतम के विरह और हृदय की शाश्वत उदासी को बेहद सुंदरता से उजागर करती है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
कूचा-ए-यार ऐन कासी है जोगी-ए-दिल वहाँ का बासी है
महबूब की गली बिल्कुल पवित्र काशी के समान है, और मेरे दिल का जोगी वहीं का स्थायी निवासी है।
2
पी के बैराग की उदासी सूँ दिल पे मेरे सदा उदासी है
प्रियतम के वैराग्य (उदासीनता) के दुःख के कारण मेरे दिल पर हमेशा उदासी छाई रहती है।
3
ऐ सनम तुझ जबीं उपर ये ख़ाल हिंदवी हर-द्वार बासी है
हे प्रिय, तुम्हारे माथे पर यह काला तिल ऐसा लगता है मानो कोई हिंदू हरिद्वार का निवासी होकर वहाँ बस गया हो।
4
ज़ुल्फ़ तेरी है मौज जमुना की तिल नज़िक उस के जियूँ सनासी है
तुम्हारी ज़ुल्फ़ यमुना नदी की लहर जैसी है और उसके पास मौजूद तिल किसी संन्यासी की तरह दिखाई देता है।
5
घर तिरा है ये रश्क-ए-देवल-ए-चीं उस में मुद्दत सूँ दिल उपासी है
तुम्हारा घर चीन के बुतख़ाने के लिए भी ईर्ष्या का कारण है, और बहुत लंबे समय से मेरा दिल उसमें एक उपासक की तरह मौजूद है।
6
ये सियह-ज़ुल्फ़ तुझ ज़नख़दाँ पर नागनी ज्यूँ कुँवे पे प्यासी है
तुम्हारी ठोड़ी पर पड़ी यह काली ज़ुल्फ़ ऐसी लगती है जैसे कोई प्यासी नागिन कुएं पर बैठी हो।
7
तास-ए-ख़ुर्शीद ग़र्क़ है जब सूँ बर में तेरे लिबास-ए-तासी है
जब से तुम्हारे बदन पर ज़रीदार (तासी) लिबास सुशोभित है, तब से सूरज का थाल मानो चमक खोकर डूब गया है।
8
जिस की गुफ़्तार में नहीं है मज़ा सुख़न उस का तआ'म बासी है
जिस व्यक्ति की बातचीत में कोई मज़ा या आकर्षण नहीं होता, उसकी शायरी या कलाम बासी खाने की तरह बेस्वाद होता है।
9
ऐ 'वली' जो लिबास तन पे रखा आशिक़ाँ के नज़िक लिबासी है
ऐ वली, जो लिबास तुमने अपने शरीर पर पहन रखा है, वह आशिक़ों की नज़र में केवल एक दिखावा या बाहरी पर्दा है।
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