ग़ज़ल

सजन टुक नाज़ सूँ मुझ पास आ आहिस्ता आहिस्ता

سجن ٹک ناز سوں مجھ پاس آ آہستہ آہستہ
वली दकनी· Ghazal· 5 shers· radif: आहिस्ता आहिस्ता

यह ग़ज़ल प्रेम, आत्मीयता और नाज़-ओ-अंदाज़ से भरी एक भावपूर्ण पुकार है, जिसमें आशिक़ अपने महबूब से नज़ाकत के साथ क़रीब आने और दिल के राज़ बयां करने का अनुरोध करता है। वह अपने माशूक़ को दुनिया और रक़ीबों की बातों को दरकिनार कर अपनी सच्ची मुहब्बत पर तवज्जो देने के लिए प्रेरित करता है।

Source: rekhta · HI

गीत सुनें
लिपि व अर्थ
1
सजन टुक नाज़ सूँ मुझ पास आ आहिस्ता आहिस्ता छुपी बातें अपस दिल की सुना आहिस्ता आहिस्ता
हे प्रियतम, तनिक नाज़-ओ-अंदाज़ के साथ धीरे-धीरे मेरे पास आओ और अपने दिल की छुपी हुई बातें हौले-हौले मुझे सुनाओ।
2
ग़रज़ गोयाँ की बाताँ कूँ न ला ख़ातिर मनीं हरगिज़ सजन इस बात कूँ ख़ातिर में ला आहिस्ता आहिस्ता
मतलबी लोगों की बातों पर कभी ध्यान मत दो; ऐ महबूब, मेरी इस बात को धीरे-धीरे अपने दिल में जगह दो।
3
हर इक की बात सुनने पर तवज्जोह मत कर ऐ ज़ालिम रक़ीबाँ उस सीं होवेंगे जुदा आहिस्ता आहिस्ता
ऐ ज़ालिम महबूब, हर किसी की बातों पर ध्यान मत दो; रक़ीब (प्रतिद्वंद्वी) धीरे-धीरे खुद ही तुमसे दूर हो जाएँगे।
4
मबादा मोहतसिब बदमस्त सुन कर तान में आवे तम्बूरा आह का ऐ दिल बजा आहिस्ता आहिस्ता
ऐ दिल, अपनी आहों का तंबूरा बहुत आहिस्ता बजा, कहीं ऐसा न हो कि मुहतसिब इसकी धुन सुनकर मदहोश या बेकाबू हो जाए।
5
'वली' हरगिज़ अपस के दिल कूँ सीने में न रख ग़म-गीं कि बर लावेगा मतलब कूँ ख़ुदा आहिस्ता आहिस्ता
ऐ वली! अपने दिल को सीने में हरगिज़ उदास मत रखो, क्योंकि ईश्वर धीरे-धीरे तुम्हारी मुराद ज़रूर पूरी करेगा।
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