ग़ज़ल

इक बोसा दीजिए मिरा ईमान लीजिए

اک بوسہ دیجئے مرا ایمان لیجئے
अकबर इलाहाबादी· Ghazal· 5 shers· radif: लीजिए

यह ग़ज़ल प्रेम के चुलबुले और रसिक मिज़ाज को दर्शाती है, जहाँ आशिक़ एक बोसे के बदले अपना ईमान तक न्योछावर करने को तैयार है। इसमें माशूक़ की नज़ाकत, नाज़-नख़रों और बेपरवाही का बड़े ही दिलचस्प और दिलकश अंदाज़ में बयान किया गया है।

Source: rekhta · HI

गीत सुनें
लिपि व अर्थ
1
इक बोसा दीजिए मिरा ईमान लीजिए गो बुत हैं आप बहर-ए-ख़ुदा मान लीजिए
मुझे एक चुंबन दीजिए और बदले में मेरा ईमान ले लीजिए; भले ही आप एक बुत हैं, फिर भी ख़ुदा के वास्ते मेरी यह बात मान लीजिए।
2
दिल ले के कहते हैं तिरी ख़ातिर से ले लिया उल्टा मुझी पे रखते हैं एहसान लीजिए
मेरा दिल लेने के बाद वे कहते हैं कि यह तो सिर्फ़ तुम्हारी ख़ातिर ले लिया है, और उल्टे मुझी पर अहसान जता रहे हैं।
3
ग़ैरों को अपने हाथ से हँस कर खिला दिया मुझ से कबीदा हो के कहा पान लीजिए
महबूब ने ग़ैरों को तो मुस्कुराते हुए अपने हाथों से पान खिला दिया, लेकिन मुझसे नाराज़ होकर बस रूखेपन से कहा कि पान लीजिए।
4
मरना क़ुबूल है मगर उल्फ़त नहीं क़ुबूल दिल तो न दूँगा आप को मैं जान लीजिए
मुझे मरना मंज़ूर है लेकिन प्यार करना मंज़ूर नहीं है। आप चाहे मेरी जान ले लीजिए, मगर मैं आपको अपना दिल कभी नहीं दूँगा।
5
हाज़िर हुआ करूँगा मैं अक्सर हुज़ूर में आज अच्छी तरह से मुझे पहचान लीजिए
मैं आगे भी अक्सर आपकी सेवा में उपस्थित हुआ करूँगा, इसलिए आज ही मुझे अच्छी तरह से देख और पहचान लीजिए।
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