ग़ज़ल
इश्क़ बेताब-ए-जाँ-गुदाज़ी है
عشق بیتاب جاں گدازی ہے
यह ग़ज़ल प्रेम की गहन तड़प और उसकी रूहानी पाकीज़गी को दर्शाती है, जहाँ इश्क़ में जान पिघलाने वाली बेताबी और हुस्न में दिलनवाज़ी का शौक है। इसमें इश्क़ को एक मुक़द्दस मज़हब बताया गया है, जिसमें दर्द, आँसुओं और आत्म-समर्पण से ही सच्ची बंदगी मुमकिन होती है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
इश्क़ बेताब-ए-जाँ-गुदाज़ी है
हुस्न मुश्ताक़-ए-दिल-नवाज़ी है
इश्क़ अपनी जान को पिघलाने और मिटाने के लिए बेचैन है, जबकि हुस्न दिलों को बहलाने और उन पर मेहरबानी करने का इच्छुक है।
2
अश्क ख़ूनीं सूँ जो किया है वज़ू
मज़हब-ए-इश्क़ में नमाज़ी है
जिसने ख़ून के आँसुओं से वज़ू किया है, वही इश्क़ के मज़हब में सच्चा नमाज़ी माना जाता है।
3
जो हुआ राज़-ए-इश्क़ सूँ आगाह
वो ज़माने का फ़ख़्र-ए-राज़ी है
जो व्यक्ति प्रेम के रहस्य से परिचित हो जाता है, वह अपने दौर का फ़ख़्र-ए-राज़ी (सबसे बड़ा विद्वान) बन जाता है।
4
पाक-बाज़ाँ सूँ यूँ हुआ मफ़्हूम
इश्क़ मज़मून-ए-पाक-बाज़ी है
पवित्र और निष्कपट लोगों से यह बात समझ आई है कि इश्क़ असल में पाकीज़गी का ही विषय है।
5
जा के पहुँची है हद्द-ए-ज़ुल्मत कूँ
बस-कि तुझ ज़ुल्फ़ में दराज़ी है
तुम्हारी ज़ुल्फ़ों में इतनी ज़्यादा लंबाई है कि वे अंधेरे की आख़िरी हद तक पहुँच गई हैं।
6
तजरबे सूँ हुआ मुझे ज़ाहिर
नाज़ मफ़्हूम बे-नियाज़ी है
तजुर्बे से मुझ पर यह बात ज़ाहिर हुई है कि नाज़ वास्तव में बेपरवाही या बे-नियाज़ी का ही मतलब है।
7
ऐ 'वली' ऐश-ए-ज़ाहिरी का सबब
जल्वा-ए-शाहिद-ए-मजाज़ी है
ऐ वली, दुनियावी या बाहरी सुख और आनंद का कारण इस सांसारिक (नश्वर) महबूब का जलवा या दर्शन है।
Comments · 0
Free — just your email. You'll come right back here.
No comments yet. Be the first.
