ग़ज़ल

जिस दिलरुबा सूँ दिल कूँ मिरे इत्तिहाद है

جس دل ربا سوں دل کوں مرے اتحاد ہے
वली दकनी· Ghazal· 5 shers· radif: है

इस ग़ज़ल में शायर अपने प्रियतम के साथ दिल के गहरे जुड़ाव और आध्यात्मिक एकता को व्यक्त करता है, जहाँ प्रियतम का दीदार ही आँखों की सबसे बड़ी मुराद है। यह रचना निष्कपट प्रेम और सच्चे विश्वास को रेखांकित करती है, जिसमें एक निर्मल हृदय दर्पण की तरह महबूब के ख़याल को अपने भीतर संजोए रखता है।

Source: rekhta · HI

गीत सुनें
लिपि व अर्थ
1
जिस दिलरुबा सूँ दिल कूँ मिरे इत्तिहाद है दीदार उस का मेरी अँखाँ की मुराद है
जिस महबूब से मेरे दिल का गहरा लगाव और नाता है, उसका दीदार करना ही मेरी आँखों की तमन्ना है।
2
रखता है बर में दिलबर-ए-रंगीं ख़याल कूँ मानिंद आरसी के जो साफ़ ए'तिक़ाद है
जिसका विश्वास आईने की तरह बिल्कुल साफ़ और पाक होता है, वह कल्पना के सुंदर और रंगीन महबूब को अपने आगोश में रखता है।
3
शायद कि दाम-ए-इश्क़ में ताज़ा हुआ है बंद वादे पे गुल-रुख़ाँ के जिसे ए'तिमाद है
जिसे ख़ूबसूरत महबूबों के वादों पर अब भी यक़ीन है, वह ज़रूर इश्क़ के जाल में नया-नया फँसा होगा।
4
बाक़ी रहेगा जौर-ओ-सितम रोज़-ए-हश्र लग तुझ ज़ुल्फ़ की जफ़ा में निपट इम्तिदाद है
ज़ुल्म और सितम क़यामत के दिन तक बाक़ी रहेगा, क्योंकि तुम्हारी ज़ुल्फ़ों की बेवफ़ाई और सितम में बहुत ज़्यादा फैलाव और लंबाई है।
5
मक़्सूद-ए-दिल है उस का ख़याल ऐ 'वली' मुझे ज्यूँ मुझ ज़बाँ पे नाम-ए-मोहम्मद मुराद है
ऐ वली, मेरे दिल का मक़सद केवल महबूब का ख़्याल है, ठीक उसी तरह जैसे मेरी ज़बान पर हज़रत मुहम्मद का नाम मेरी सबसे बड़ी मुराद है।
Comments · 0

Free — just your email. You'll come right back here.

No comments yet. Be the first.