ग़ज़ल
दिल को सुकून रूह को आराम आ गया
دل کو سکون روح کو آرام آ گیا
यह ग़ज़ल प्रेम, विरह और आत्मिक शांति की गहन अनुभूति को दर्शाती है, जहाँ प्रियतम की स्मृति जीवन के सारे कष्टों और यहाँ तक कि मृत्यु को भी सुकून में बदल देती है। कवि ने ज़िंदगी के उतार-चढ़ाव और दुखों के बीच अपने महबूब के प्रति अनन्य समर्पण और बेइख़्तियार याद को भावुकता से अभिव्यक्त किया है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
दिल को सुकून रूह को आराम आ गया
मौत आ गई कि दोस्त का पैग़ाम आ गया
दिल को सुकून और आत्मा को चैन मिल गया है; क्या मौत आ पहुँची है या फिर महबूब का पैग़ाम आ गया है।
2
जब कोई ज़िक्र-ए-गर्दिश-ए-अय्याम आ गया
बे-इख़्तियार लब पे तिरा नाम आ गया
जब भी ज़माने के बुरे वक़्त या गर्दिशों का ज़िक्र हुआ, अनायास ही मेरे होंठों पर तुम्हारा नाम आ गया।
3
ग़म में भी है सुरूर वो हंगाम आ गया
शायद कि दौर-ए-बादा-ए-गुलफ़ाम आ गया
ऐसा समय आ गया है जब दुःख में भी आनंद और नशा महसूस हो रहा है; शायद गुलाबी शराब का दौर शुरू हो गया है।
4
दीवानगी हो अक़्ल हो उम्मीद हो कि यास
अपना वही है वक़्त पे जो काम आ गया
चाहे दीवानगी हो, अक़्ल हो, उम्मीद हो या निराशा, असल में अपना वही है जो ज़रूरत के वक़्त काम आ जाए।
5
दिल के मुआमलात में नासेह शिकस्त क्या
सौ बार हुस्न पर भी ये इल्ज़ाम आ गया
हे नसीहत देने वाले, दिल के मामलों में हार कैसी? यह इल्ज़ाम तो हुस्न पर भी सैकड़ों बार आ चुका है।
6
सय्याद शादमाँ है मगर ये तो सोच ले
मैं आ गया कि साया तह-ए-दाम आ गया
शिकारी खुश है, लेकिन उसे यह सोचना चाहिए कि जाल में वास्तव में मैं आया हूँ या केवल मेरी परछाई आई है।
7
दिल को न पूछ मारका-ए-हुस्न-ओ-इश्क़ में
क्या जानिए ग़रीब कहाँ काम आ गया
हुस्न और इश्क़ के युद्ध में दिल का हाल मत पूछिए, न जाने वह बेचारा कहाँ मारा गया।
8
ये क्या मक़ाम-ए-इश्क़ है ज़ालिम कि इन दिनों
अक्सर तिरे बग़ैर भी आराम आ गया
ऐ ज़ालिम, यह इश्क़ की कैसी मंज़िल है कि इन दिनों अक्सर तुम्हारे बिना भी मुझे सुकून और आराम मिल जाता है।
9
अहबाब मुझ से क़त-ए-तअल्लुक़ करें 'जिगर'
अब आफ़्ताब-ए-ज़ीस्त लब-ए-बाम आ गया
ऐ जिगर, अब दोस्त मुझसे सारे रिश्ते-नाते तोड़ लें, क्योंकि मेरी ज़िंदगी का सूरज अब ढलने के कगार पर आ पहुँचा है।
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