ग़ज़ल
हक़ वफ़ा के जो हम जताने लगे
حق وفا کے جو ہم جتانے لگے
यह ग़ज़ल प्रेम में वफ़ादारी के हक़ और महबूब की बेरुखी व बहानों की व्यथा को दर्शाती है। जब आशिक़ अपनी निष्ठा और अधिकार व्यक्त करता है, तो महबूब रहस्यमयी मुस्कान और झूठे उज़्र पेश करके उसके जज़्बात को नज़रअंदाज़ कर देता है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
हक़ वफ़ा के जो हम जताने लगे
आप कुछ कह के मुस्कुराने लगे
जब हम अपनी वफ़ा का हक़ जताने लगे, तो आप कुछ कहकर मुस्कुराने लगे।
2
था यहाँ दिल में तान-ए-वस्ल-ए-अदू
उज़्र उन की ज़बाँ पे आने लगे
यहाँ मेरे दिल में दुश्मन से उनके मिलने का ताना पैदा ही हुआ था कि उनकी ज़ुबान पर बहाने आने लगे।
3
हम को जीना पड़ेगा फ़ुर्क़त में
वो अगर हिम्मत आज़माने लगे
अगर वे मेरी हिम्मत का इम्तिहान लेने लगे, तो मुझे जुदाई के दर्द में भी जीना पड़ेगा।
4
डर है मेरी ज़बाँ न खुल जाए
अब वो बातें बहुत बनाने लगे
मुझे डर है कि कहीं मेरी ज़बान न खुल जाए, क्योंकि अब वे बहुत बातें और बहाने बनाने लगे हैं।
5
जान बचती नज़र नहीं आती
ग़ैर उल्फ़त बहुत जताने लगे
मुझे अपनी जान बचती हुई नज़र नहीं आ रही है, क्योंकि अब ग़ैर मुझसे बहुत ज़्यादा प्यार और अपनापन जताने लगे हैं।
6
तुम को करना पड़ेगा उज़्र-ए-जफ़ा
हम अगर दर्द-ए-दिल सुनाने लगे
अगर हम अपने दिल का दर्द सुनाने लगें, तो आपको अपने ज़ुल्म और बेवफ़ाई के लिए बहाने बनाने पड़ेंगे।
7
सख़्त मुश्किल है शेवा-ए-तस्लीम
हम भी आख़िर को जी चुराने लगे
हर बात चुपचाप मान लेने और समर्पण करने का तरीका बहुत कठिन है, आखिरकार अब हम भी इससे जी चुराने लगे हैं।
8
जी में है लूँ रज़ा-ए-पीर-ए-मुग़ाँ
क़ाफ़िले फिर हरम को जाने लगे
मेरे दिल में यह इच्छा है कि मैं मयख़ाने के बुज़ुर्ग (पीर-ए-मुग़ाँ) की रज़ा और इजाज़त ले लूँ, क्योंकि क़ाफ़िले एक बार फिर पवित्र हरम की ओर रवाना होने लगे हैं।
9
सिर्र-ए-बातिन को फ़ाश कर या रब
अहल-ए-ज़ाहिर बहुत सताने लगे
हे ईश्वर, आंतरिक सत्य और रहस्य को प्रकट कर दे, क्योंकि बाहरी दिखावे में उलझे लोग मुझे बहुत सताने लगे हैं।
10
वक़्त-ए-रुख़्सत था सख़्त 'हाली' पर
हम भी बैठे थे जब वो जाने लगे
रुख़्सत यानी विदाई का वक़्त हाली पर बहुत भारी और सख़्त था; हम भी वहीं मौजूद बैठे थे जब वे जाने लगे।
Comments · 0
Free — just your email. You'll come right back here.
No comments yet. Be the first.
