ग़ज़ल

दिल में किसी के राह किए जा रहा हूँ मैं

دل میں کسی کے راہ کئے جا رہا ہوں میں
जिगर मुरादाबादी· Ghazal· 13 shers· radif: किए जा रहा हूँ मैं

यह ग़ज़ल प्रेम के उस सम्मोहक और विरोधाभासी अहसास को दर्शाती है, जहाँ दिल में जगह बनाने की ललक को एक खूबसूरत गुनाह माना गया है। शायर आत्म-विनाश और विरह की आहों से भली-भांति वाकिफ़ होते हुए भी समर्पण और इश्क़ की इस मदहोशी में खोया रहता है।

Source: rekhta · HI

गीत सुनें
लिपि व अर्थ
1
दिल में किसी के राह किए जा रहा हूँ मैं कितना हसीं गुनाह किए जा रहा हूँ मैं
मैं किसी के दिल में अपनी जगह बनाता जा रहा हूँ, और ऐसा करके मैं कितना खूबसूरत गुनाह करता जा रहा हूँ।
2
दुनिया-ए-दिल तबाह किए जा रहा हूँ मैं सर्फ़-ए-निगाह-ओ-आह किए जा रहा हूँ मैं
मैं अपने दिल की दुनिया को बर्बाद करता जा रहा हूँ और इसे केवल देखने और आहें भरने पर खर्च किए जा रहा हूँ।
3
फ़र्द-ए-अमल सियाह किए जा रहा हूँ मैं रहमत को बे-पनाह किए जा रहा हूँ मैं
मैं गुनाह करके अपने कर्मों के आमाल-नामे को काला करता जा रहा हूँ, और इस तरह खुदा की रहमत को बेइंतहा बनाए जा रहा हूँ।
4
ऐसी भी इक निगाह किए जा रहा हूँ मैं ज़र्रों को मेहर-ओ-माह किए जा रहा हूँ मैं
मैं ऐसी नज़र डाल रहा हूँ कि धूल के मामूली कणों को भी सूरज और चाँद बनाए जा रहा हूँ।
5
मुझ से लगे हैं इश्क़ की अज़्मत को चार चाँद ख़ुद हुस्न को गवाह किए जा रहा हूँ मैं
मेरी वजह से इश्क़ की अज़्मत और प्रतिष्ठा में चार चाँद लगे हैं, और इस बात का गवाह मैं ख़ुद हुस्न को बना रहा हूँ।
6
दफ़्तर है एक मानी-ए-बे-लफ़्ज़-ओ-सौत का सादा सी जो निगाह किए जा रहा हूँ मैं
मैं जो एक सीधी-सादी नज़र डाले जा रहा हूँ, वह बिना किसी शब्द और आवाज़ के अर्थों का एक पूरा दफ़्तर (संग्रह) है।
7
आगे क़दम बढ़ाएँ जिन्हें सूझता नहीं रौशन चराग़-ए-राह किए जा रहा हूँ मैं
जिन लोगों को रास्ता दिखाई नहीं दे रहा है वे आगे कदम बढ़ाएं, क्योंकि मैं रास्ते में दीये रोशन करता जा रहा हूँ।
8
मासूमी-ए-जमाल को भी जिन पे रश्क है ऐसे भी कुछ गुनाह किए जा रहा हूँ मैं
मैं लगातार ऐसे गुनाह किए जा रहा हूँ, जिन पर हुस्न की मासूमियत को भी रश्क (ईर्ष्या) होता है।
9
तन्क़ीद-ए-हुस्न मस्लहत-ए-ख़ास-ए-इश्क़ है ये जुर्म गाह गाह किए जा रहा हूँ मैं
हुस्न पर नुक्ताचीनी करना इश्क़ की एक ख़ास हिकमत और ज़रूरत है, और मैं यह जुर्म कभी-कभार किए जा रहा हूँ।
10
उठती नहीं है आँख मगर उस के रू-ब-रू नादीदा इक निगाह किए जा रहा हूँ मैं
महबूब के सामने मेरी आँखें नहीं उठती हैं, फिर भी मैं छुपकर या अनदेखे तरीक़े से उन पर एक नज़र डाले जा रहा हूँ।
11
गुलशन-परस्त हूँ मुझे गुल ही नहीं अज़ीज़ काँटों से भी निबाह किए जा रहा हूँ मैं
मैं पूरे बाग़ से प्रेम करने वाला हूँ, इसलिए मुझे सिर्फ़ फूल ही प्रिय नहीं है, बल्कि मैं काँटों के साथ भी रिश्ता निभा रहा हूँ।
12
यूँ ज़िंदगी गुज़ार रहा हूँ तिरे बग़ैर जैसे कोई गुनाह किए जा रहा हूँ मैं
मैं तुम्हारे बिना अपनी ज़िंदगी इस तरह गुज़ार रहा हूँ, जैसे मैं लगातार कोई गुनाह किए जा रहा हूँ।
13
मुझ से अदा हुआ है 'जिगर' जुस्तुजू का हक़ हर ज़र्रे को गवाह किए जा रहा हूँ मैं
हे 'जिगर', मैंने अपनी खोज और लगन का हक़ पूरी तरह से अदा कर दिया है, और मैं राह के हर कण को अपना गवाह बनाते हुए आगे बढ़ रहा हूँ।
Comments · 0

Free — just your email. You'll come right back here.

No comments yet. Be the first.