ग़ज़ल
हक़ीक़त महरम-ए-असरार से पूछ
حقیقت محرم اسرار سے پوچھ
यह ग़ज़ल इस विचार को प्रस्तुत करती है कि किसी भी अनुभव की वास्तविक गहराई केवल वही जान सकता है जिसने उसे भोगा हो, जैसे शराब का मज़ा केवल मय-ख़्वार जानता है। शायर अपनी तन्हाई और असीम प्रेम की दास्तान बयां करते हुए कहता है कि उसकी वफ़ा और दर्द की सच्ची गवाह सिर्फ उसके घर की दीवारें हैं।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
हक़ीक़त महरम-ए-असरार से पूछ
मज़ा अंगूर का मय-ख़्वार से पूछ
किसी रहस्य की सच्चाई उस व्यक्ति से पूछो जो भेदों को जानता हो, ठीक वैसे ही जैसे अंगूर का असली मज़ा केवल शराब पीने वाला ही बता सकता है।
2
वफ़ा अग़्यार की अग़्यार से सुन
मिरी उल्फ़त दर ओ दीवार से पूछ
औरों यानी प्रतिद्वंद्वियों की वफ़ादारी की बातें खुद उन्हीं से सुन लो, लेकिन अगर मेरी मोहब्बत के बारे में जानना है तो अपने घर के दर-ओ-दीवार से पूछो।
3
हमारी आह-ए-बे-तासीर का हाल
कुछ अपने दिल से कुछ अग़्यार से पूछ
मेरी निष्प्रभावी आह का क्या असर हुआ, यह हाल थोड़ा अपने दिल से और थोड़ा गैरों से पूछ कर जान लो।
4
दिलों में डालना ज़ौक़-ए-असीरी
कमंद-ए-गेसू-ए-ख़मदार से पूछ
दिलों में क़ैद होने का शौक़ कैसे जगाया जाता है, यह बात महबूब की घुंघराली ज़ुल्फ़ों के फंदे से पूछो।
5
दिल-ए-महजूर से सुन लज़्ज़त-ए-वस्ल
नशात-ए-आफ़ियत बीमार से पूछ
मिलन का असली आनंद उस दिल से सुनो जो जुदाई झेल रहा हो, और सेहत व तंदुरुस्ती की खुशी किसी बीमार से पूछो।
6
नहीं जुज़ गिर्या-ए-ग़म हासिल-ए-इश्क़
हमारी चश्म-ए-दरिया-बार से पूछ
इश्क़ का परिणाम ग़म के आँसुओं के सिवा कुछ नहीं है; अगर इस बात की तस्दीक़ करनी हो तो मेरी दरिया की तरह बहने वाली आँखों से पूछ लो।
7
नहीं आब-ए-बक़ा जुज़ जल्वा-ए-दोस्त
किसी लब-तिश्ना-ए-दीदार से पूछ
महबूब के दीदार के सिवा अमरता का कोई जल नहीं है, यह बात दीदार के किसी प्यासे से पूछकर देखो।
8
फ़रेब-ए-वादा-ए-दिलदार की क़द्र
शहीद-ए-ख़ंजर-ए-इंकार से पूछ
महबूब के झूठे वादे की क़ीमत उस शख़्स से पूछो जो उसके इनकार के ख़ंजर से शहीद हुआ है।
9
फ़ुग़ान-ए-शौक़ को माने नहीं वस्ल
ये नुक्ता अंदलीब-ए-ज़ार से पूछ
महबूब से मिलन भी इश्क़ की फ़रियाद और तड़प को रोक नहीं सकता; यह बारीक बात तुम रोती हुई बुलबुल से पूछ लो।
10
तसव्वुर में किया करते हैं जो हम
वो तस्वीर-ए-ख़याल-ए-यार से पूछ
हम अपनी कल्पना में क्या किया करते हैं, यह बात महबूब के ख़याल से बनी तस्वीर से पूछो।
11
मता-ए-बे-बहा है शेर-ए-'हाली'
मिरी क़ीमत मिरी गुफ़्तार से पूछ
हाली की शायरी एक बेशक़ीमती दौलत है, मेरी असली क़ीमत और औक़ात मेरी बातों और कलाम से पूछो।
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